नई दिल्ली/23 अक्टूबर 2026: हत्या जैसे गंभीर आपराधिक मामले में केवल व्हाट्सऐप मैसेज के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब संदेश भेजने और पाने वाले गवाह ही उसकी पुष्टि न करें। सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए निचली अदालत और हाईकोर्ट की दोषसिद्धि को पलट दिया और आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संदेशों से अधिकतम संदेह पैदा हो सकता है, लेकिन संदेह अपने आप में दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट WhatsApp मैसेज हत्या केस में अदालत ने क्या कहा?
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के दो गवाहों के बीच हुई कथित व्हाट्सऐप चैट आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थी। चैट में दावा किया गया था कि मृतक की हत्या में आरोपी की भूमिका थी और मौत से पहले दोनों के बीच झगड़ा हुआ था।
हालांकि, मामले में महत्वपूर्ण बात यह रही कि न तो संदेश भेजने वाले गवाह और न ही उसे प्राप्त करने वाले गवाह ने आरोपी को मृतक के साथ कथित झगड़ा करते या उस पर हमला करते हुए देखने की बात स्वीकार की। दोनों गवाहों ने संदेशों के आदान-प्रदान से भी इनकार किया।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, जब गवाह ही कथित घटना की पुष्टि नहीं कर रहे थे, तब केवल इस चैट के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती थी।
हत्या के मामले में कैसे सामने आया WhatsApp मैसेज?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 9 फरवरी 2019 को एक व्यक्ति का शव खुले मैदान में मिला था। शव के आसपास एक मोटरसाइकिल रस्सी से बंधी हुई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर हत्या की आशंका जताई गई, जिसके बाद अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
जांच के दौरान पुलिस ने अभियोजन पक्ष के गवाह संख्या 5 और 6 के मोबाइल फोन जब्त किए। फॉरेंसिक जांच में सामने आया कि 7 और 8 फरवरी 2019 की दरमियानी रात गवाह संख्या 5 के फोन से गवाह संख्या 6 के फोन पर एक व्हाट्सऐप संदेश भेजा गया था। इस संदेश में आरोपी की कथित संलिप्तता और मृतक के साथ उसके झगड़े का जिक्र था।
पुलिस ने आरोपी के बयान के आधार पर उसके घर से एक लोहे की रॉड, पेचकस, खून के निशान वाली शर्ट और खून लगी मिट्टी बरामद करने का भी दावा किया। इसके बावजूद अभियोजन पक्ष के लिए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को इस तरह जोड़ना जरूरी था कि आरोपी के अपराध में शामिल होने की बात संदेह से परे साबित हो सके।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 क्यों नहीं हुई लागू?
सुप्रीम कोर्ट ने कथित व्हाट्सऐप चैट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 6 के तहत प्रासंगिक मानने से इनकार कर दिया। इस प्रावधान के तहत किसी घटना से इतने निकट रूप से जुड़े तथ्य को प्रासंगिक माना जा सकता है कि वह उसी लेन-देन का हिस्सा हो।
अदालत ने कहा कि इस मामले में मौत का समय ठोस साक्ष्य से निर्धारित नहीं किया जा सका था। इसलिए यह स्थापित करना मुश्किल था कि संदेश अपराध के समय या उसके इतने करीब भेजा गया था कि उसे उसी घटना का हिस्सा माना जा सके।
पीठ के अनुसार, गवाहों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान यह साबित नहीं करता कि मृतक घटना वाली रात आरोपी के घर में मौजूद था या आरोपी ने उस पर हमला किया था। अधिकतम इससे आरोपी के खिलाफ संदेह पैदा हो सकता था, जो दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं था।
दोनों गवाहों के मुकरने से कमजोर हुआ अभियोजन पक्ष का मामला
आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उसकी दोषसिद्धि मुख्य रूप से ऐसे संदेशों पर आधारित थी, जिनकी पुष्टि अभियोजन पक्ष के दोनों गवाहों ने नहीं की। दोनों ने न केवल आरोपी को मृतक के साथ झगड़ा करते देखने से इनकार किया, बल्कि कथित चैट भेजने या प्राप्त करने की बात भी स्वीकार नहीं की।
जस्टिस मनोज मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना। पीठ ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामले में अभियोजन पक्ष को सभी जरूरी परिस्थितियों को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना होता है। केवल संदेह या अपुष्ट संदेश के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संदेशों को साक्ष्य अधिनियम की धारा 7 के तहत प्रासंगिक मानने की संभावना पर विचार किया जाए, तब भी गवाहों द्वारा उनके आदान-प्रदान से इनकार किए जाने के कारण वे अभियोजन पक्ष के दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने पलटा
आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और धारा 201 के तहत आरोप लगाए गए थे। सत्र न्यायालय ने उसे दोषी ठहराया और हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का मूल्यांकन करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को पलट दिया और आरोपी को बरी कर दिया।
फैसले का संदेश: डिजिटल सबूत की विश्वसनीयता भी जरूरी
यह फैसला आपराधिक मामलों में डिजिटल संदेशों की साक्ष्यगत अहमियत को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। व्हाट्सऐप चैट, टेक्स्ट मैसेज या अन्य डिजिटल संवाद जांच में उपयोगी सुराग दे सकते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी मात्र से अपराध में किसी व्यक्ति की संलिप्तता अपने आप साबित नहीं हो जाती।
अदालत के सामने यह भी महत्वपूर्ण होता है कि संदेश किसने भेजा, उसकी पुष्टि कौन कर रहा है, उसका घटना से क्या संबंध है और क्या अन्य साक्ष्य उसके दावे का समर्थन करते हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर स्पष्ट किया कि संदेह और कानूनी रूप से साबित अपराध के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।






