नई दिल्ली/20 अक्टूबर 2026: दुनिया में बढ़ते तनाव, युद्ध की आशंका और आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच से सदस्य देशों को ठोस कदम उठाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में केवल बैठकें करने से समस्याओं का समाधान नहीं होगा। देशों को साझा चुनौतियों पर सहमति बनाकर व्यावहारिक कदम उठाने होंगे, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर पड़ रहे दबाव को कम किया जा सके।
ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में आयोजित SCO की बैठक में राजनाथ सिंह ने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, तकनीकी असमानता तथा आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण रखा। उनका संदेश साफ था—बदलती वैश्विक परिस्थितियों में सहयोग केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका लाभ आम लोगों और सभी सदस्य देशों तक पहुंचना चाहिए।
SCO Summit: वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता पर राजनाथ सिंह की चिंता
राजनाथ सिंह ने वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक माहौल लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में जारी संघर्ष और देशों के बीच बढ़ते तनाव का असर व्यापार तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं पर पड़ रहा है। इसका परिणाम केवल सरकारों और कारोबार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम लोगों की जिंदगी, वस्तुओं की उपलब्धता और महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है।
आज किसी एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है। ऊर्जा की आपूर्ति बाधित होने, परिवहन महंगा होने या जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता घटने से आर्थिक दबाव बढ़ता है। ऐसे में देशों के बीच तालमेल और भरोसे को मजबूत करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ती चुनौतियां
रक्षा मंत्री ने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा को वैश्विक सहयोग के अहम मुद्दों के रूप में सामने रखा। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में बाधा आने पर परिवहन से लेकर उद्योगों तक लागत बढ़ सकती है। इसका असर कई बार रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है।
इसी तरह, खाद्यान्न की उपलब्धता और उसकी समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करना भी बड़ी चुनौती है। संघर्ष, व्यापारिक बाधाएं और परिवहन संबंधी समस्याएं खाद्य बाजारों को प्रभावित कर सकती हैं। कमजोर अर्थव्यवस्थाओं और कम आय वाले परिवारों पर इसका असर अधिक पड़ने की आशंका रहती है।
ऐसे हालात में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उद्देश्य केवल संकट पर चर्चा करना नहीं, बल्कि जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था को अधिक भरोसेमंद बनाना भी होना चाहिए।
नई तकनीक की दौड़ से बढ़ सकती है आर्थिक असमानता
तकनीकी विकास ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर खोले हैं, लेकिन इसके लाभ सभी देशों और समाजों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहे हैं। राजनाथ सिंह ने इस चुनौती की ओर ध्यान दिलाते हुए समावेशी विकास और तकनीक के बेहतर इस्तेमाल की जरूरत पर जोर दिया।
जहां विकसित देश नई तकनीकों में निवेश करके अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ा रहे हैं, वहीं संसाधनों की कमी से जूझ रहे देशों के सामने इस दौड़ में बने रहने की चुनौती है। यदि तकनीकी विकास का लाभ सीमित देशों या वर्गों तक ही सिमटकर रह गया, तो आर्थिक और सामाजिक असमानता और गहरी हो सकती है।
भारत का दृष्टिकोण है कि तकनीक का इस्तेमाल विकास को गति देने, व्यापार को आसान बनाने और समाज के व्यापक हिस्से तक अवसर पहुंचाने के लिए किया जाना चाहिए।
व्यापार और निवेश बढ़ाने पर भारत का जोर
SCO Summit में भारत ने सदस्य देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को अधिक समावेशी बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। राजनाथ सिंह के संदेश के अनुसार, सहयोग ऐसा होना चाहिए जिससे प्रत्येक सदस्य देश को लाभ मिले और आर्थिक विकास के अवसर व्यापक हों।
उन्होंने मजबूत और संकटों का सामना करने में सक्षम आपूर्ति श्रृंखलाएं विकसित करने, व्यापारिक प्रक्रियाओं को आसान बनाने तथा निवेश को प्रोत्साहित करने की जरूरत रेखांकित की। भारत ने वर्ष 2026 से 2030 की अवधि के लिए बहुपक्षीय व्यापार एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम की कार्ययोजना को अपनाने का भी समर्थन किया।
इसका व्यापक उद्देश्य आर्थिक प्रगति को केवल व्यापार के आंकड़ों तक सीमित न रखना, बल्कि उसके लाभ को आम नागरिकों तक पहुंचाना है।
चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का महत्व
क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के लिए संपर्क व्यवस्था भी अहम है। राजनाथ सिंह ने अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाओं का उल्लेख किया। ये पहल भारत, मध्य एशिया और दूसरे बाजारों के बीच व्यापारिक संपर्क बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
बेहतर परिवहन संपर्क से माल की आवाजाही आसान हो सकती है, व्यापार की लागत घट सकती है और नए आर्थिक अवसर पैदा हो सकते हैं। विशेष रूप से मध्य एशिया जैसे क्षेत्र के लिए व्यापक बाजारों तक पहुंच आर्थिक सहयोग को नई दिशा दे सकती है।
हालांकि, भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि संपर्क परियोजनाएं संबंधित देशों से परामर्श और उनकी संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर आधारित होनी चाहिए। किसी परियोजना की दीर्घकालिक सफलता के लिए इन सिद्धांतों का पालन जरूरी है।
मुंबई में क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को लेकर हुई पहल का भी जिक्र
रक्षा मंत्री ने मुंबई में आयोजित मध्य एशिया की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वित्तपोषण से जुड़ी संगोष्ठी का भी उल्लेख किया। इसमें मध्य एशियाई देशों और SCO के साझेदार देशों की भागीदारी को क्षेत्रीय सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया।
इस पहल के साथ SCO एशियाई आर्थिक संवाद के आयोजन का भी जिक्र किया गया। ऐसी बैठकों का उद्देश्य क्षेत्रीय संपर्क, बुनियादी ढांचे में निवेश और आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए साझा अवसर तलाशना है।
SCO Summit से क्या संदेश निकला?
राजनाथ सिंह के संबोधन का मुख्य संदेश यह है कि वैश्विक संकटों का मुकाबला अकेले करना कठिन है। ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा से लेकर तकनीकी विकास तथा व्यापार तक, कई चुनौतियां ऐसी हैं जिनके समाधान के लिए देशों के बीच समन्वय जरूरी है।
लेकिन सहयोग की असली कसौटी केवल बैठकें, घोषणाएं या समझौते नहीं हैं। महत्वपूर्ण यह है कि सदस्य देश साझा फैसलों को जमीन पर कितना उतार पाते हैं और उनका लाभ आम लोगों तक किस हद तक पहुंचता है।
नोट: प्रकाशन से पहले दुशांबे में हुई बैठक की तारीख, राजनाथ सिंह के मूल संबोधन और उद्धरणों का आधिकारिक स्रोत से मिलान अवश्य करें। प्रस्तुत खबर में दिए गए बयानों को मूल भाषण से शब्दशः उद्धरण के रूप में सत्यापित किए बिना प्रत्यक्ष उद्धरण चिह्नों में नहीं रखा गया है।






