नई दिल्ली/19 अक्टूबर 2026। दिल्ली हाईकोर्ट ने 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देकर उसके स्वास्थ्य, गरिमा और भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को प्राथमिकता दी है। अदालत ने कहा कि किशोरावस्था से गुजर रही नाबालिग से बच्चे को जन्म देने और उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा ने मामले की परिस्थितियों, पीड़िता की उम्र और चिकित्सा बोर्ड की रिपोर्ट पर विचार करते हुए यह फैसला सुनाया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में विचार केवल गर्भावस्था समाप्त करने के कानूनी प्रावधानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पीड़िता के मानवाधिकार, मानसिक स्थिति और सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अधिकार को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: नाबालिग के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा ने पीड़िता की कम उम्र और उसकी परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना। अदालत के समक्ष यह सवाल था कि क्या 16 वर्ष की दुष्कर्म पीड़िता को 31 सप्ताह की गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य किया जाना उसके हित में होगा।
पीड़िता की ओर से दायर याचिका में उसकी मां ने आशंका जताई थी कि गर्भावस्था जारी रहने से लड़की को गंभीर मानसिक आघात पहुंच सकता है। अदालत ने मामले के तथ्यों और चिकित्सा संबंधी रिपोर्ट पर विचार करने के बाद गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दे दी।
अदालत की टिप्पणी का मूल भाव यह था कि जो लड़की स्वयं अभी किशोरावस्था से गुजर रही है, उससे मातृत्व और बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा उसकी परिस्थितियों को नजरअंदाज करके नहीं की जा सकती।
31 सप्ताह की गर्भावस्था पर मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट क्या कहती है?
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पीड़िता को दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चिकित्सा बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि लड़की गर्भावस्था समाप्त करने की चिकित्सकीय प्रक्रिया से गुजरने के लिए स्वस्थ है।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट इस मामले में महत्वपूर्ण रही, क्योंकि गर्भावस्था 31 सप्ताह तक पहुंच चुकी थी। इतनी उन्नत अवस्था में गर्भावस्था समाप्त करने का निर्णय सामान्य गर्भपात के मामलों से अलग चिकित्सकीय और कानूनी पहलुओं से जुड़ा होता है।
अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों और चिकित्सा संबंधी जानकारी पर विचार करते हुए पीड़िता के सर्वोत्तम हित में फैसला दिया।
गर्भपात कानून में क्या है प्रावधान?
भारत में गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act) गर्भावस्था समाप्त करने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इसके संशोधित प्रावधानों के तहत निर्धारित शर्तों पर सामान्यतः 20 सप्ताह तक और विशेष श्रेणियों में 24 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है। दुष्कर्म पीड़िताएं भी निर्धारित शर्तों के अधीन विशेष श्रेणी में आती हैं।
हालांकि, 31 सप्ताह की गर्भावस्था का मामला सामान्य समय-सीमा से आगे का है। ऐसे मामलों में परिस्थितियों, लागू कानूनी प्रावधानों और चिकित्सकीय पहलुओं पर विशेष विचार करना पड़ता है। दिल्ली हाईकोर्ट के सामने भी पीड़िता के अधिकारों, स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़ा यही महत्वपूर्ण प्रश्न था।
DNA जांच के लिए सुरक्षित रखे जाएंगे भ्रूण के ऊतक
अदालत ने गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने के साथ आपराधिक मामले में साक्ष्यों के संरक्षण का भी ध्यान रखा। चिकित्सकों को भ्रूण के ऊतकों को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर डीएनए जांच की जा सके।
इस निर्देश का उद्देश्य गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया और आपराधिक मामले की जांच के बीच आवश्यक समन्वय बनाए रखना है। इससे संबंधित मामले में उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि गर्भावस्था समाप्त करने की चिकित्सकीय प्रक्रिया पर होने वाला पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।
यदि बच्चा जीवित पैदा हुआ तो क्या होगा?
अदालत ने संभावित चिकित्सकीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए एक अतिरिक्त निर्देश भी दिया। यदि प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा होता है, तो अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसे हरसंभव चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जाए।
ऐसी स्थिति में नाबालिग और उसके परिवार की इच्छा को ध्यान में रखते हुए, निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार बच्चे को गोद देने की व्यवस्था भी की जा सकती है।
इस निर्देश से स्पष्ट है कि अदालत ने केवल गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने तक ही विचार सीमित नहीं रखा, बल्कि संभावित परिणामों और उनसे जुड़ी चिकित्सकीय जिम्मेदारियों को भी ध्यान में रखा।
पीड़िता की पहचान गोपनीय रखने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता और नाबालिग पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने का निर्देश दिया है। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़िता की निजता की रक्षा करना बेहद महत्वपूर्ण है, विशेषकर तब, जब पीड़िता नाबालिग हो।
अदालत का यह निर्देश मीडिया रिपोर्टिंग और सार्वजनिक चर्चा के दौरान पीड़िता की पहचान उजागर होने से रोकने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है।
पीड़िता की उम्र, स्वास्थ्य और गरिमा पर केंद्रित रहा फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों में पीड़िता की परिस्थितियों पर संवेदनशीलता से विचार करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जहां यौन हिंसा के कारण नाबालिग गर्भवती हो जाती है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया के साथ उसकी उम्र, मानसिक स्थिति, स्वास्थ्य और भविष्य को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
अदालत ने 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देकर पीड़िता के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी। साथ ही, डीएनए जांच के लिए साक्ष्य सुरक्षित रखने, चिकित्सकीय सहायता सुनिश्चित करने और पहचान गोपनीय रखने के निर्देश देकर मामले के कानूनी तथा मानवीय दोनों पहलुओं पर ध्यान दिया।






