मुंबई/19 अक्टूबर 2026। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना लोकतंत्र में नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के इस्तेमाल के दौरान कानून-व्यवस्था और आम जनता की सुविधाओं का ध्यान रखना भी जरूरी है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार, 19 अक्टूबर को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई पर व्यापक रोक लगाने का आदेश देने से पहले प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि और आम लोगों को होने वाली असुविधा जैसे पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ लगाए गए उन आरोपों पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के खिलाफ मुंबई में हाल में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस पर लोगों को कथित रूप से अवैध हिरासत में लेने का आरोप लगाया गया है। अदालत ने राज्य सरकार से इन याचिकाओं पर जवाब मांगा है।
बॉम्बे हाईकोर्ट में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई का मामला
यह जनहित याचिका अधिवक्ता सावर देवरे की ओर से दायर की गई थी। इसमें दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के समर्थन में मुंबई में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों के खिलाफ पुलिस की कथित कार्रवाई और हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाया गया।
याचिका में मांग की गई थी कि पुलिस को शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने से रोका जाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मांग पर विचार करते हुए संकेत दिया कि ऐसे मामलों में सभी परिस्थितियों का आकलन करना जरूरी है। केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन विरोध प्रदर्शन की आड़ में कानून का उल्लंघन भी स्वीकार्य नहीं है।
चार लोगों को हिरासत में लेने का आरोप
सोमवार को वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह ने चार लोगों की ओर से आवेदन पेश किया। इन लोगों का दावा था कि पिछले सप्ताह शांतिपूर्ण मार्च में शामिल होने के बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था।
अधिवक्ता सिंह के अनुसार, चारों लोगों को एक दिन हिरासत में रखने के बाद घर जाने के लिए कहा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद उन्हें उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया।
वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने दो अन्य लोगों के हलफनामे भी अदालत के सामने रखे। इन हलफनामों में दावा किया गया कि पुलिस ने संबंधित लोगों को उनके घरों से हिरासत में लिया था।
ये आरोप याचिका और संबंधित पक्षों की ओर से रखे गए दावों का हिस्सा हैं। इन पर अदालत में आगे विचार किया जाना है।
‘प्रदर्शन शांतिपूर्ण होना चाहिए’, अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक व्यक्ति को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। अदालत ने महाराष्ट्र में पुलिस की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस ने काफी संयम बरता है।
पीठ ने प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि पर विचार करने की जरूरत भी बताई। अदालत की टिप्पणी थी कि निर्दोष नागरिकों की आड़ में आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों को प्रदर्शनों का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।
इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत, दोनों के बीच संतुलन पर जोर दिया।
शिवाजी पार्क के निवासियों ने भी उठाया मुद्दा
सुनवाई के दौरान मध्य मुंबई के शिवाजी पार्क के निवासियों की ओर से पेश दो वकीलों ने भी आवेदन दाखिल किए। उन्होंने दावा किया कि हाईकोर्ट का एक आदेश शिवाजी पार्क में इस तरह के प्रदर्शनों पर रोक लगाता है। इसके बावजूद पिछले सप्ताह वहां प्रदर्शन आयोजित किए गए थे।
अदालत ने कहा कि इन शिकायतों पर भी याचिकाकर्ताओं और महाराष्ट्र सरकार को अपना जवाब देना होगा। इससे मामले में एक और पहलू जुड़ गया है—जहां प्रदर्शनकारियों के अधिकारों पर विचार किया जा रहा है, वहीं सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल और स्थानीय निवासियों को होने वाली असुविधा का सवाल भी उठाया गया है।
अब 19 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से याचिकाओं में लगाए गए आरोपों पर जवाब मांगा है। अदालत ने शिवाजी पार्क में प्रदर्शन से संबंधित शिकायतों पर भी पक्षकारों को जवाब देने का निर्देश दिया।
मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 नवंबर की तारीख तय की गई है। अब इस सुनवाई में राज्य सरकार का पक्ष और संबंधित आवेदनों पर प्रस्तुत जवाब महत्वपूर्ण होंगे।
यह मामला शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार, पुलिस की शक्तियों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन से जुड़ा है। अदालत की आगे की कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि संबंधित परिस्थितियों में पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों की मांगों पर किस तरह विचार किया जाता है।








